Shikar Karna

ऑफिस काम बनाम फ्रीलांसिंग

ऑफिस की जिंदगी, एक चक्की जैसा घूमता पहिया,
हर सुबह उठना, बंधे नियमों की सुई।
कभी ईमेल्स, कभी मीटिंग्स, कभी फोन की घंटी,
और फिर भी, फ्री समय की छांव कहीं दूर!।

यहां है शिकार, हर दिन नए लक्ष्य का पीछा,
कभी डेडलाइन के शिकारी, कभी कागजों के शिकार।
सोचते हैं अगर छुट्टी मिले तो जरा आराम कर लें,
लेकिन काम की लहर कभी पीछे नहीं हटती।

फ्रीलांसिंग में कुछ अलग ही मज़ा है,
अपनी ही दुनिया में, अपना ही सारा पैटर्न है।
कभी दिन की शुरुआत देर से होती है,
तो कभी रातें ख्वाबों में खो जाने लगती हैं।

यहां शिकार करने की बजाय, खुद अपनी ज़िंदगी को घेरते हैं,
चुनते हैं कौन सा काम, किस समय करना है।
आज़ादी की ज़िंदगी, थोड़ी अनिश्चितताओं में बसी है,
पर कभी-कभी इसे देखकर भी एक नयी चुनौती सामने आती है।

कभी ऑफिस की तरह एक स्थिरता होती नहीं,
हर दिन एक नया संघर्ष, फिर भी बढ़ते रहते हैं।
लेकिन फिर भी, सोने से पहले जो मिलता है वह मीठा,
खुद की शर्तों पर जीने का मजा है अलग ही कुछ खास।

ऑफिस में हो जंग, तो फ्रीलांसिंग में होता है अपना धैर्य,
एक ओर जिंदगी है टाईम की कमी, दूसरी है ख़ुद की परिभाषा।
दोनों की दुनिया, अपनी-अपनी चाहत की राहें—
कभी शिकार, कभी आराम… सबका अपना मज़ा है!